अपठित गद्यांश -साहित्य की शाश्वतता (Apathit Gadyansh in hindi for class 10 with answers)

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Apathit Gadyansh with Answers in Hindi unseen passage 

साहित्य की शाश्वतता का प्रश्न एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। क्या साहित्य शाश्वत होता है? यदि हाँ, तो किस मायने में? क्या कोई साहित्य अपने रचनाकाल के सौ वर्ष बीत जाने पर भी उतना ही प्रासंगिक रहता है, जितना वह अपनी रचना के समय था? अपने समय या युग का निर्माता साहित्यकार क्या सौ वर्ष बाद की परिस्थितियों का भी युग-निर्माता हो सकता है। समय बदलता रहता है, परिस्थितियाँ और भावबोध बदलते हैं, साहित्य बदलता है और इसी के समानांतर पाठक की मानसिकता और अभिरुचि भी बदलती है।

अत: कोई भी कविता अपने सामयिक परिवेश के बदल जाने पर ठीक वही उत्तेजना पैदा नहीं कर सकती, जो उसने अपने रचनाकाल के दौरान की होगी। कहने का तात्पर्य यह है कि एक विशेष प्रकार के साहित्य के श्रेष्ठ अस्तित्व मात्र से वह साहित्य हर युग के लिए उतना ही विशेष आकर्षण रखे, यह आवश्यक नहीं है। यही कारण है कि वर्तमान युग में इंगला-पिंगला, सुषुम्ना, अनहद, नाद आदि पारिभाषिक शब्दावली मन में विशेष भावोत्तेजन नहीं करती।

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साहित्य की श्रेष्ठता मात्र ही उसके नित्य आकर्षण का आधार नहीं है। उसकी श्रेष्ठता का युगयुगीन आधार हैं, वे जीवन-मूल्य तथा उनकी अत्यंत कलात्मक अभिव्यक्तियाँ जो मनुष्य की स्वतंत्रता तथा उच्चतर मानव-विकास के लिए पथ-प्रदर्शक का काम करती हैं। पुराने साहित्य का केवल वही श्री-सौंदर्य हमारे लिए ग्राह्य होगा, जो नवीन जीवन-मूल्यों के विकास में सक्रिय सहयोग दे अथवा स्थिति-रक्षा में सहायक हो। कुछ लोग साहित्य की सामाजिक प्रतिबद्धता को अस्वीकार करते हैं।

वे मानते हैं कि साहित्यकार निरपेक्ष होता है और उस पर कोई भी दबाव आरोपित नहीं होना चाहिए। किंतु वे भूल जाते हैं कि साहित्य के निर्माण की मूल प्रेरणा मानव-जीवन में ही विद्यमान रहती है। जीवन के लिए ही उसकी सृष्टि होती है। तुलसीदास जब स्वांत:सुखाय काव्य-रचना करते हैं, तब अभिप्राय यह नहीं रहता कि मानव-समाज के लिए इस रचना का कोई उपयोग नहीं है, बल्कि उनके अंत:करण में संपूर्ण संसार की सुख-भावना एवं हित-कामना सन्निहित रहती है। जो साहित्यकार अपने संपूर्ण व्यक्तित्व को व्यापक लोक-जीवन में सन्निविष्ट कर देता है, उसी के हाथों स्थायी एवं प्रेरणाप्रद साहित्य का सृजन हो सकता है।

उपर्युक्त अपठित गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

प्रश्न –

(क) प्रस्तुत गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) पुराने साहित्य के प्रति अरुचि का क्या कारण है?
(ग) जीवन के विकास में पुराने साहित्य का कौन-सा अंश स्वीकार्य है और कौन-सा नहीं?
(घ) साहित्य की शाश्वतता का आशय स्पष्ट करते हुए बताइए कि यह शाश्वत होता है या नहीं।
(ड) सामयिक परिवेश बदलने का कविता पर क्या प्रभाव पड़ता है और क्यों?
(च) साहित्य की श्रेष्ठता के आधार क्या हैं?
(छ) कुछ लोग साहित्य की सामाजिक प्रतिबद्धता अस्वीकारने की भूल किस तरह करते हैं? यह किस तरह अनुचित है?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

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‘भावोत्तेजना’, ‘समानांतर’ शब्दों का संधि-विच्छेद कीजिए।
‘जीवन-मूल्य’, ‘साहित्यकार’ शब्दों का विग्रह करके समास का नाम बताइए।
उत्तर –

(क) शीर्षक-साहित्य की प्रासंगिकता।
(ख) वर्तमान युग में पुराने साहित्य के प्रति अरुचि हो गई है, क्योंकि पाठक की अभिरुचि बदल गई है और वर्तमान युग में पुराने साहित्य को वह अपने लिए प्रासंगिक नहीं पाता। इसके अलावा देशकाल और परिस्थिति के अनुसार साहित्य की प्रासंगिकता बदलती रहती है।
(ग) जीवन के विकास में पुराने साहित्य का केवल वही अंश स्वीकार्य है, जो नवीन जीवन-मूल्यों के विकास में सक्रिय सहयोग दे। पुराने साहित्य का वह अंश अस्वीकार कर दिया जाता है, जो अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता खो चुका है तथा जीवन-मूल्यों से असंबद्ध हो चुका होता है।
(घ) साहित्य की शाश्वतता का तात्पर्य है-हर काल एवं परिस्थिति में अपनी उपयोगिता बनाए रखना एवं प्रासंगिकता को कम न होने देना। साहित्य को शाश्वत इसलिए नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह समय के साथ अपनी प्रासंगिकता खो बैठता है। इसके अलावा रचनाकार अपने काल की परिस्थितियों के अनुरूप ही साहित्य-सृजन करता है।
(ड) सामयिक परिवेश के बदलाव का कविता पर बहुत प्रभाव पड़ता है। परिवेश बदलने से कविता पाठक के मन में वह उत्तेजना नहीं उत्पन्न कर पाती, जो वह अपने रचनाकाल के समय करती थी। इसका कारण है-समय, परिस्थितियाँ और भावबोध बदलने के अलावा पाठकों की अभिरुचि और मानसिकता में भी बदलाव आ जाना।
(च) साहित्य की श्रेष्ठता के आधार हैं वे जीवन-मूल्य तथा उनकी अत्यंत कलात्मक अभिव्यक्तियाँ, जो मनुष्य की स्वतंत्रता तथा उच्चतर मानव-विकास के लिए पथ-प्रदर्शक का कार्य करती हैं।
(छ) कुछ लोग साहित्य की सामाजिक प्रतिबद्धता अस्वीकारने की भूल यह मानकर करते हैं कि साहित्य निरपेक्ष होता है तथा उस पर दबाव नहीं होना चाहिए। चूँकि साहित्य मानव-जीवन के सापेक्ष होता है और जीवन के लिए ही उसकी सृष्टि की जाती है, अत: कुछ लोगों द्वारा साहित्य को निरपेक्ष मानना अनुचित है।
(ज) शब्द संधि-विच्छेद
भावोत्तेजना भाव + उत्तेजना
समानांतर समान + अंतर
शब्द विग्रह समास का नाम
जीवन-मूल्य जीवन के मूल्य संबंध तत्पुरुष
साहित्यकार साहित्य को रचना करने वाला कर्मधारय समास

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