मांगलिक दोष क्या है और उसका निवारण क्या है

Manglik dosh kya hai aur manglik dosh ke upay

‘मंगली’ शब्द सुनते ही वर कन्या के अभिभावक सतर्क हो जाते हैं। विवाह संबंधों के लिए मांगलिक शब्द एक प्रकार से भय तथा अमंगल का सूचक बन गया है। इसीलिए यहाँ पर मंगली दोष विचार परिहार एवं निवारण विषयक आवश्यक जानकारी प्रस्तुत की जा रही है।
जातक की कुण्डली में विवाह और दाम्पत्य जीवन में संबंधित लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम व द्वादश भाव प्रमुख भाव हैं। जीवन में अगर वैवाहिक जीवन में कोई भी प्रकार का तूफान आता है तो इन भावों पर मंगल, सूर्य, शनि, राहू, केतु का प्रभाव होना एक प्रमुख कारण है। उत्तर भारत में द्वितीय भाव को महत्व नहीं दिया जाता है। दक्षिण भारत में द्वितीय भाव को भी महत्व दिया जाता है। इसके लिए यह श्ललोक अपने आप में पूर्ण लगता है। ‘लग्न धने व्यये च पाताले जामित्रे चाश्टमे कुजे। स्त्री भत्र्तु र्विनाषाय, भत्र्तु स्त्री विनाशकः ।।’
अर्थात लग्न, द्वितीय, द्वादश, अष्टम, चतुर्थ व सप्तम भाव में मंगल हो तो पति पत्नी एक दूसरे के विनाश का कारण बनते हैं।
जन्मकुण्डली में इन भावों में मंगल आदि पाप ग्रहों के बैठने से मांगलिक दोष होता है। ऐसा दोष क्यों माना जाता है? इसके पीछे उचित कारण क्या है?
मंगल दोष की तीव्रता सर्वाधिक अष्टम भाव में, उससे कम सप्तम, चतुर्थ, द्वादश, द्वितीय भाव व लग्न में होती है। मंगल सर्वाधिक दोषप्रद है। इसके बाद शनि, राहु व केतु तथा सूर्य सब से कम दोषप्रद हैं।
नीचे दी गई स्थिति में अधिक चौकस एवं सावधान रहने की आवश्यकता है।
1. यदि मंगल एवं शनि की युति सातवें या आठवें भाव में है। 2. यदि मंगल अष्टम में व शनि सप्तम में हो। 3. यदि मंगल सप्तम में व शनि अष्टम में हो। 4. यदि मंगल अष्टम या सप्तम में व शनि द्वितीय में हो। 5. यदि मंगल सप्तम में व शनि लग्न में हो। 6. यदि मंगल लग्न में व शनि सप्तम में हो।
उपरोक्त ग्रह स्थितियाँ विवाह एवं दाम्पत्य जीवन के लिए हानिकारक होती हैं। यदि इन्हीं के साथ शुभ ग्रह सप्तमेष होकर अष्टम भाव में चला जाता है तो वैवाहिक जीवन नर्क बन जाता है। यदि दुर्भाग्य से शुक्र भी लग्न या सप्तम में त्रिक भाव में हो तो स्थिति और भी भयावह हो सकती है।
मंगल दोष का परिहारः जन्मपत्रियों का मिलान करते समय सभी ज्योतिषियों को मंगल दोष व उसके परिहारों को सही रूप से लागू करना चाहिये जिससे ज्योतिष जैसे पावन विषय पर कोई अंगुली न उठाये। मंगल दोष से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। मंगल दोष के निम्न परिहार होते हैं जो क्रमशः: इस प्रकार हैं।
1. लग्न में मेष राशि का मंगल, चतुर्थ में वृष्चिक का मंगल, सप्तम में मकर का मंगल, अष्टम में कर्क का मंगल, बारहवें धनु का मंगल दोषपूर्ण नहीं होता है। ज्योतिष के अनेक विद्वानों ने निम्न रूप में भी मंगल दोष पूर्ण नहीं माना है। 2. द्वितीय भाव में मंगल मिथुन व कन्या में हो। 3. द्वादश भाव में मंगल वृश व तुला में हो। 4. चतुर्थ भाव में मेष एवं वृष्चिक का मंगल हो। 5. सप्तम में मकर व कर्क में मंगल हो। 6. अष्टम में धनु या मीन में हो। 7. सिंह व कुंभ राशि का मंगल हो। 8. गुरू या शुक्र लग्न में हो। 1. लग्न में कर्क व सिंह राशि का मंगल। 10. इन भावों में मंगल व शनि वक्री हो तो।
इस प्रकार वर की कुण्डली में मंगल सप्तम या अष्टम में हो व कन्या की कुण्डली में इसकी विपरीत लग्न या द्वितीय में हो। चलित चक्र में मंगल की परिस्थिति में अंतर आ जाये तो भी मंगल दोष पूर्ण नहीं रहता है।
वास्तविक ग्रह मेलापक का कार्य भावी वर कन्या की कुण्डलियों में मंगल दोष व अन्य ग्रहों की स्थिति का सामज्जस्य सावधानीपूर्वक बैठाना है अन्यथा दोनों का दाम्पत्य सुख कष्टमय हो सकता है।
मांगलिक दोष के निवारणः
मंगल दोष किसी की कुण्डली में हो तो उसका निदान निम्न प्रकार से किया जा सकता हैः
1. जातक को दीप जलाकर मंगल ग्रह की पूजा करने के बाद श्री मंगल चंडिका स्तोत्र के 108 दिन तक नित्य 21 पाठ करने चाहिए।
2. माँ पार्वती की पूजा कर पार्वती स्वयंवर के 21 पाठ करने चाहिए।
3. कुम्भ विवाह और पीपल या विष्णु प्रतिमा के साथ विवाह करना चाहिए।
4. मंगल यंत्र की प्रतिष्ठा उचित मुहूर्त्त में करवा करके उसी पूजा करनी चाहिए।
5. लड़कियों को सावित्री व्रत का अनुष्ठान विधिव्रत करवाना चाहिए।
6. मंगल स्तोत्र के पाठ करने चाहिए।
7. विवाह होने के बाद अगर मांगलिक होने का पता चले तो मंगल यंत्र की स्थापना करवाकर पूजा कर या मंगला गौरी का व्रत करें।