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रोज़ की मसाफ़त से चूर हो गए दरिया – अहमद फ़राज़ शायरी

रोज़ की मसाफ़त से चूर हो गए दरिया

रोज़ की मसाफ़त से चूर हो गये दरिया
पत्थरों के सीनों पे थक के सो गये दरिया

जाने कौन काटेगा फ़स्ल लालो-गोहर की
रेतीली ज़मीनों में संग बो गये दरिया

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ऐ सुहाबे-ग़म ! कब तक ये गुरेज़ आँखों से
इंतिज़ारे-तूफ़ाँ में ख़ुश्क हो गये दरिया

चाँदनी से आती है किसको ढूँढने ख़ुश्बू
साहिलों के फूलों को कब से रो गये दरिया

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बुझ गई हैं कंदीलें ख़्वाब हो गये चेहरे
आँख के जज़ीरों को फिर डुबो गये दरिया

दिल चटान की सूरत सैले-ग़म प’ हँसता है
जब न बन पड़ा कुछ भी दाग़ धो गये दरिया

ज़ख़्मे-नामुरादी से हम फ़राज़ ज़िन्दा हैं
देखना समुंदर में ग़र्क़ हो गये दरिया

(मसाफ़त=यात्रा, लालो-गोहर=हीरे मोतियों
की खेती, संग=पत्थर, सुहाबे-ग़म=दुख के
मित्रो, गुरेज़=उपेक्षा, कंदीलें=दीपिकाएँ,
जज़ीरों=टापुओं, सैले-ग़म=दुखों की बाढ़)

तू कि अंजान है इस शहर के अंदाज़ समझ

तू कि अनजान है इस शहर के आदाब समझ
फूल रोए तो उसे ख़ंद-ए-शादाब समझ

कहीं आ जाए मयस्सर तो मुक़द्दर तेरा
वरना आसूदगी-ए-दहर को नायाब समझ

हसरते-गिरिया में जो आग है अश्कों में नहीं
ख़ुश्क आँखों को मेरी चश्मा-ए-बेआब समझ

मौजे-दरिया ही को आवार-ए-सदशौक़ न कह
रेगे-साहिल को भी लबे-तिश्न-ए-सैलाब समझ

ये भी वा है किसी मानूस किरन की ख़ातिर
रोज़ने-दर को भी इक दीदा-ए-बेख़्वाब समझ

अब किसे साहिले-उम्मीद से तकता है ‘फ़राज़’
वो जो इक किश्ती-ए-दिल थी उसे ग़र्क़ाब समझ

(आदाब=शिष्टाचार, ख़ंद-ए-शादाब=प्रफुल्ल मुस्कान,
मयस्सर=प्राप्त हो जाए, आसूदगी-ए-दहर=संतोष का
युग, नायाब=अप्राप्य, हसरते-गिरिया=रोने की इच्छा,
आवार-ए-सदशौक़=कुमार्गी, रेगे-साहिल=तट की मिट्टी,
लबे-तिश्न-ए-सैलाब=बाढ़ के लिए तरसते होंठ, वा=खुला
हुआ, मानूस=परिचित, रोज़ने-दर=द्वार के छिद्र, ग़र्क़ाब=
डूबी हुई)

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